कुछ ख्वाहिशों को समेटे हुए एक नयी ग़ज़ल आप सभी की ख़िदमत में पेश कर रहा हूँ। हमेशा की तरह आपकी तवज्जो का तलबगार हूँ....
सरफ़रोशों का इक कारवां चाहिए,
हमको क़दमों तले आसमां चाहिए।
आइये दिल मिला के सफ़र को चलें,
हौसलों की नयी दास्तां चाहिए।
आग सीने में कब तक सुलगती रहे?
अब तो जज़्बात को भी जुबां चाहिए।
सींच दे जो लहू से चमन प्यार का,
अपने गुलशन को वो बागबां चाहिए।
तख़्त हिल जाएंगे, ताज़ गिर जाएंगे,
सर पे बांधे कफ़न हर जवां चाहिए।
हो गया दफ़्न दो गज़ में 'सीतेश' तो क्या?
उसकी ग़ज़लों को सारा जहां चाहिए।
$ seetesh azaad $
09708143123
09507143123
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