Monday, September 2, 2013

''हम जैसा'' नामुराद सुधरने तो लगा है!!!

रात 1 बजे दिल का तूफ़ान लफ़्ज़ों में ढल कर कागज़ पर उतर आया... फिर देखा तो लगा कि शायद एक ग़ज़ल बन चुकी है... आप सभी की नज्र कर रहा हूँ... फैसला कीजिये...

वादों से अपने आज मुकरने तो लगा है,
इन्सां का जानवर भी उभरने तो लगा है।
मुद्दत के बाद आँख अचानक जो खुली है,
रौशन फिजाएं देख के डरने तो लगा है।
नज़रे-करम की आस में थक कर जो सो गया,
ख़्वाबों में खुद इंसाफ वो करने तो लगा है।
साज़िश के तीर उसके कामयाब यूँ हुए,
कुनबा ये मोहब्बत का बिखरने तो लगा है।
वो शख्स जो फूलों से भी घायल हुआ कभी,
काँटों के रास्तों से गुजरने तो लगा है।
अफ़वाह शहरे-यार में फैला रहा है कौन?
'हम जैसा' नामुराद सुधरने तो लगा है।

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