Sunday, July 28, 2013

Seetesh Azaad's blog...:

कहीं मेरी कलम से अचानक धडकनों की आवाज सुनाई देने लगी और शब्दों ने ये शक्ल ली...
अगर तुम हो पावन सा अमृत-कलश तो
मुझे उसकी छोटी सी धरा बहुतहै
अगर तुम हो शीतल नदी प्रेम के तो
मुझे उस नदी का किनारा बहुतहै
मेरे संग हो तुम, मैं हूँ संग तुम्हारे
परस्पर हमे ये सहारा बहुत है
जरुरत नहीं कुछ कहो तुम जुबां से
तुम्हारी पलक का इशारा बहुतहै
-सौरभ सुमन

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