Sunday, July 28, 2013

सुभाष चन्द्र बोस!!!

मेरी नई कविता 'सुभाष चन्द्र बोस' की कुछ पंक्तियाँ:
संसद भवन में नोटों की गड्डियों को लेकर जो प्रदर्शन हुआ उसपर-
संसद की अस्मिता की ऐसे उठीडोलियाँ
कोठे पे तवायफों की जैसे लगे बोलियाँ
रोते रहे गाँधी उस नोट पे जड़े हुए
संसद की देहरी पे दोषी से खड़े हुए
लोकतंत्र की कराहें आंसुओं के घुल गई
संविधान की ऋचाएं गड्डियों में तुल गई
संसद का स्वाभिमान तार-तार कर दिया
संविधान द्रोपदी सा शर्मसार कर दिया
नेता जी के पास होता तख्त हिन्दुस्तान का
विश्व देखता जूनून सख्त हिन्दुस्तान का
मुल्क का विधान बेजुबान नहीं होता यूँ
बैसाखी पे आज हिन्दुस्तान नहीं होता यूँ
फैसला वहीँ पे होता संसद कीआहों का
वहीँ पे हिसाब होता सबके गुनाहों का
ऐसे लोकशाहों का विनाश मांगता हैं देश
एक बार फिर से सुभाष मांगताहैं देश
-सीतेश अजाद..
9708143123
9507143123.

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